दीवार क्या गिरी मिरे, ख़स्ता मकान की
लोगों ने मेरे सेहन में, रस्ते बना लिए
झुका कर सर को, तेरे आस्ताँ पर
बढ़ा दी मैंने क़ीमत संगे-दर की
वही मेरी बदनसीबी, वही गर्दिशे-ज़माना
तिरे आस्ताँ से उठ कर, न मिला कोई ठिकाना
बेताबियाँ बजा मिरे, ज़ौक़े-सुजूद की
लेकिन इस आस्ताने के लायक़, यह सर कहाँ
जो झुका हो कहीं, तेरे आस्ताँ के सिवा
मिरी जबीं को तिरी, बन्दगी नसीब न हो
बैठ जाती है वहीं, रेत की मानिन्द आशोक
जब भी दीवार कोई, अज़्म से टकराती है