वह इन्सानी मसाईल, जो अभी नाक़ाबिले-हल हैं
अगर रिन्दों को फुर्सत हो, तो मैख़ाने में रख देना
जब मैकदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद
मस्जिद हो, मद्रसा हो, कोई ख़ानक़ाह हो
निकल कर दैरो-काबा से, अगर मिलता न मैख़ाना
तो ठुकराए हुए इन्साँ, ख़ुदा जाने कहाँ जाते
मैंने पूछा था कि है, मन्ज़िले-मक़्सूद कहाँ
ख़िज़्र ने राह दिखाई, मुझे मैख़ाने की
काबे में मुसलमाँ हैं, मन्दिर में हैं बरहमण
इन्सान तो ऐ वाइज़!, मैख़ाने में मिलते हैं
हरम हो, दैर हो, या मैकदा, इससे ग़रज़ क्या है
जहाँ देखा तिरा जलवा, वहीं मैंने जबीं रख दी