तेरा मिलना, तिरा नहीं मिलना
और जन्नत है क्या, जहन्नम क्या
जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई
जी काँपता है ख़ुल्द में, रखते हुए क़दम
डर है कि उस ज़मीं पे भी, आसमाँ न हो
गुनाह्गारों के दिल से, न बच के चल ज़ाहिद
यहीं कहीं तिरी जन्नत भी, पाई जाती है
इक नया दोज़ख़ बना कर, झोंक दे, तैयार हूँ
जिनसे तू नाराज़ है, उनमें न शामिल कर मुझे
शेख़ ने आते ही बज़्मे-मै, को बरहम कर दिया
अच्छी ख़ासी मेरी जन्नत को, जहन्नम कर दिया