क्या सुनाते हो कि है, हिज्र में जीना मुश्किल
तुमसे बेरह्म पे मरने से, तो आसाँ होगा
हिज्र की रात तड़प कर, काटने वाले!
क्या करेगा अगर, सहर न हुई
आज आँखों में काट दे, शबे-हिज्र
ज़िन्दगानी पड़ी है, सो लेना
मेरी हालत तिरी फ़ुर्क़त में, संभल जाएगी
क्या यह दुनिया है जो, दो दिन में बदल जाएगी
हिज्र की यह रात, कैसी रात है
एक मैं हूँ या ख़ुदा, की ज़ात है
कितने सुकँू से काट दी, पुरखों ने ज़िन्दगी
जो मिल गया नसीब से, चुप चाप खा लिया