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ग़ज़ल

आज इक अजनबी से निगाहें मिलीं

सिर्फ़ इक लम्ह-ए-मुख़्तसर के लिए

ज़िन्दगी इस तरह मुतमइन हो गयी

जैसे कुछ पा लिया उम्र भर के लिए

रायगाँ कीजिए, आप सजदे मिरे

मेरा क्या है, मैं उठ कर चला जाऊंगा

कल कहीं आप ही को, न कहना पड़े

इक जबीं चाहिए, संगे-दर के लिए

सब तिरी जुस्तुजू में, हैं खोए हुए

कोई ममनून है, कोई महरूम है

आख़िरश इस नतीजे पे पहुंचे हैं हम

तेरे जलवे नहीं हर नज़र के लिए

मैंने बख़्शीं ज़माने को, ज़ौ-पाशियाँ

और ख़ुद इक तजल्ली का मुहताज हूँ

रौश्नी देने वाले को भी कम से कम

इक दिया चाहिए, अपने घर के लिए

ऐ शकील उनकी महफ़िल में भी क्या मिला

और कुछ बढ़ गईं दिल की बेताबियाँ

सब की जानिब रही वह निगाहे-करम

हम तरसते रहे इक नज़र के लिए

उपनाम : शकील बदायूंनी

शकील बदायूंनी से अधिक

शकील बदायूंनी से अधिक नहीं है कविताओं