हादिसों से जज़्बए-तामीर, रुकता है कहीं
बिजलियाँ गिरती रहीं, और आशियाँ बनता रहा
अब बिजलियों का ख़ौफ़ भी, दिल से निकल गया
ख़ुद मेरा आशियाँ मिरी, आहों से जल गया
इस इल्तिफ़ाते-ख़ास का, ऐ बर्क़ शुकरिया!
लेकिन चमन में और भी, क्या आशियाँ न थे
यह किसने शाख़े गुल ला कर क़रीबे आशियाँ रख दी
कि मैंने शौक़े-गुल बोसी में काँटों पे, ज़बाँ रख दी
बाग़बाँ तू ही बता, किसने इसे फूँक दिया
आशियाँ मैंने बनाया था, बड़ी मेहनत से