न कोई वादा, न कोई यक़ीं, न कोई उमीद
मगर हमें तो तिरा, इन्तज़ार करना था
मुझको यह आरज़ू, वह उठाएं निक़ाब ख़ुद
उनको यह इन्तज़ार, तक़ाज़ा करे कोई
उम्रे-दराज़ माँग के, लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में
अल्लाह रे बेख़ुदी कि, तिरे पास बैठ कर
तेरा ही इन्तज़ार, किया है कभी-कभी
अब उन हुदूद में, लाया है इन्तज़ार मुझे
वह भी आ जाएं, तो आए न एतिबार मुझे
कहते हैं लोग मौत से, बद्तर है इन्तज़ार
मेरी तमाम उम्र, कटी इन्तज़ार में
ग़ज़ब किया तिरे वादे, पे एतिबार किया
तमाम उम्र क़यामत का, इन्तज़ार किया
उसके आने का, इन्तज़ार है मुझको
बाद मरने के मुँह मिरा, खुला रखना