हो बुरा इन्सान के इफ़लास का
छीन लेता है सभी अच्छाइयाँ
बशर को चाहिए, पासे-दिले-बशर रक्खे
किसी का हो रहे, या फिर किसी को कर रक्खे
मत सह्ल हमें जानो, फिरता है फ़लक बर्सों
तब ख़ाक के पर्दे से, इन्सान निकलते हैं
बशर पहलू में दिल रखता है जब तक
उसे दुनिया का ग़म खाना पड़ेगा
दर्द से आशना न हो जब तक
आदमी काम का नहीं होता
सियह-बख़्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा इन्साँ से रहता है
दर्दे-दिल के वास्ते पैदा किया इन्सान को
वर्ना ताअ़त के लिए कुछ कम न थे कर्रूबियाँ
क्या लज़्ज़ते-गुनाह से वाक़िफ़ नहीं है शेख़
फ़ितरत में है गुनाह तो इन्सान क्या करे