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हश्र-महशर -क़यामत(प्रलय)

सुनता हूँ कि, हँगाम-ए-दीदार भी होगा

इक और क़यामत है, यह बलाए क़यामत

उसको सुनने के लिए, जम्अ़ा हुआ है महशर

रह गया था जो फ़साना, मिरी रुसवाई का

उन का आना, हश्र से कुछ कम न था

और जब पलटे, क़यामत ढा गए

ता उम्र रिफ़ाक़त की, क़सम खाई थी जिसने

बिछड़ा है तो फिर मुझको, क़यामत में मिला है

इलाही! क्यों नहीं आती, क़यामत, माजरा क्या है

हमारे सामने पहलू में वह, दुश्मन के बैठे हैं

ये क़यामत से बड़ी चीज़ है, पहचान गया

एक अँगड़ाई में बस शेख़ का, ईमान गया