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गुनाह-गुनाहगार-बेगुनाह(पाप-पापी-निर्दोश)

वह कौन थे जिन्हें तौबा की, मिल गई फ़ुर्सत

यहाँ गुनाह भी करने को, ज़िन्दगी कम है

कह दिया तूने जो मासूम, तो हम हैं मासूम

कह दिया तूने गुनहगार, गुनहगार हैं हम

अब तक ख़बर न थी कि, मुहब्बत गुनाह है

अब जान कर गुनाह, किए जा रहा हूँ मैं

बेलौस, पुरख़ुलूस मुहब्बत, अगर है जुर्म

दानिस्ता यह गुनाह, किए जा रहा हूँ मैं

वह करिश्मे शाने-रहमत ने दिखाए रोज़े-हश्र

चीख़ उठ्ठा बे-गुनह, मैं भी गुनहगारों में हूँ

मैंने करीम जान के तुझको, किए गुनाह

बख़्शे न तू मुझे, तिरी रहमत से दूर है

गुनाह से हमें रग़बत न थी, मगर यारब

तिरी निगाहे-करम को भी, मुँह दिखाना था

क्या लज़्जते-गुनाह से वाक़िफ़ नहीं है शेख़

फ़ितरत में है गुनाह, तो इन्सान क्या करे