जब जब मस्जिद जाना पड़ा है
राह में इक मैख़ाना पड़ा है
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद!
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र क्या है अमीर
ख़ुदा के घर भी न जायेंगे, बिन बुलाये हुए
वो जो हम में तुम में क़रार था, तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानि वादा, निबाह का, तुम्हें याद हो कि न याद हो
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बहुत बेआबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
बुलबुल को प्यार बाग़ से, कोयल को बन से प्यार
क्यों कर न आदमी को हो, अपने वतन से प्यार
जब कभी अम्न की इन्साँ ने क़सम खाई है
लबे-इब्लीस पे हलकी सी हंसी आई है
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और