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अशआर-इ-हक़ीक़ी

‘ज़फ़र’ आदमी उसको न जानिएगा

हो वो कितना ही साहिबे फ़हमो ज़का

जिसे एैश में यादे ख़ुदा न रही

जिसे तैश में ख़ौफ़े ख़ुदा न रहा

अब तो घबरा के यह कहते हैं, कि मर जाएंगे

मर के भी चैन न पाया, तो किधर जाएंगे

मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे

कि दाना ख़ाक में मिल कर गुलो-गुलज़ार होता है

बिगड़ी हुई क़िस्मत को बदलते नहीं देखा

आ जाए जो सर पर उसे टलते नहीं देखा

मौत का भी इलाज हो शायद

ज़िन्दगी का कोई इलाज नहीं

यह जब्र भी देखा है, तारीख़ की आँखों ने

लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई

अपने शानों पे सर सलामत रख

अब सहारों का इन्तज़ार न कर