ख़ुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है
वो शाख़े-गुल पे रहें या किसी की मैय्यत पर
चमन के फ़ूल तो आदी हैं मुस्कुराने के
ख़ूब ख़ूब नोचा है ख़ुद-गरज़ निगाहांे ने
चेहरा-ए-मुरव्वत पर सैक्ड़ों ख़राशें हैं
जो किसी पर फ़िदा नहीं होता
उसका कोई ख़ुदा नहीं होता
पाल ले इक रोग नादाँ ज़िन्दगी के वास्ते
सिर्फ़ सेहत के सहारे ज़िन्दगी कटती नहीं
महसूस भी हो जाए तो होता नहीं बयाँ
नाज़ुक सा है जो फ़र्क़ गुनाहो-सवाब में
मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं
ज़िन्दगी भी जान ले कर जाएगी
ढूँढा बहुत, नज़र नहीं आया मुझे ”अशोक“
लगता है मेरे अह्द का इंसान मर गया