दुश्मनों की शिनाख़्त मुश्किल है
वरना अपनों में पाए जाते हैं
दुश्मनी जम कर करो, लेकिन यह गुंजाइश रहे
गर कभी हम एक हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों
अहबाब मुझसे किस लिए नाराज़ हो गए
मैं बात कर रहा था अन्धेरे के तीर की
दुश्मनी जब किसी से होती है
इब्तेदा दोस्ती से होती है
क़ब्र में रख कर न ठहरा कोई दोस्त
मैं नए घर में अकेला रह गया
ये पत्थर किस तरफ़ से आ रहे हैं
यहाँ तो आश्ना कोई नहीं है
वाक़िफ़ न थे किसी की, कभी दुश्मनी से हम
पहचानने लगे हैं, तिरी दोस्ती से हम
मुनाफ़िक़ दोस्तों के दरमियाँ जीना क़यामत है
ख़ुदा का शुक्र है लेकिन, मिरा ईमाँ सलामत है