हाए! उस काफ़िर के दस्ते-नाज़ से
शेख़ जी पीते ही इन्साँ हो गए
ख़त्म होती जा रही है आदमीयत शह्र से
ख़सलतें देखो तो इन्साँ भेड़िये से कम नहीं
ज़िन्दगी में इस क़दर सदमे सहे
दिल पिघल कर आँख से बहने लगा
था फ़लक भी शरीके-ग़म मेरा
लोग कहते है अश्क को शबनम
इस में पिन्हाँ हैं शुक्र के जज़्बात
यह तो जानाँ! ख़ुशी के आँसू हैं
इससे बढ़ कर कोई भी नश्शा नहीं
ज़ब्ते-ग़म में, आँसुओं को पी गया
है मिरे लब पे तबस्सुम रक़्साँ
यह अलग बात है दिल रोता है
आग पिन्हाँ थी मिरे अश्कों में
आप समझे थे आब के क़तरे
ग़म तो ग़म हैं ख़ुशी में भर आए
मुझको अश्कों पे एतबार नहीं
मैं इबादत समझ के पीता था
तौबा कर के गुनाह कर बैठा
नफ़रतें दिल से मिटाओ तो कोई बात बने
प्यार की शम्मएं जलाओ तो कोई बात बने
नेकी बदी की अब कोई मीज़ान ही नहीं
ईमां की बात ये है कि ईमान ही नहीं
शम्मए-इख़्लासो-यक़ीन दिल में जला कर चलिए
ज़ुल्मते-यास में उम्मीद जगा कर चलिए
रस्मे-उल्फ़त जहाँ में आम करो
प्यार से दुश्मनों को राम करो
उसको ग़ुरूरे-हुस्न ने क्या क्या बना दिया
पत्थर बना दिया, कभी शीशा बना दिया
मन्ज़िले-सिदक़ो-सफ़ा का रास्ता अपनाइये
कारवाने-ज़िन्दगी के रहनुमा बन जाइये
पलकों पे इन्तिज़ार का मौसम सजा लिया
उस से बिछड़ के रोग गले से लगा लिया
पत्थर ही रहने दीजिए शीशा न कीजिए
अहबाब से वफ़ा का तक़ाज़ा न कीजिए
ये शंख ये अज़ान सलामत रहे तो अच्छा है
वतन की शान सलामत रहे तो अच्छा है
जो ज़रूरी है कार कर पहले
शुक्रे-परवरदिगार कर पहले
जो भी देता है वो बन्दे को ख़ुदा देता है
पेड़ का साया भला पेड़ को क्या देता है