दुआ को हाथ क्यों उठते हैं, मेरे चारा-साज़ों के
ज़बान से क्यों नहीं कहते कि, उम्मीदे-शिफ़ा कम है
क्यों दुआ मांग के, तौहीने-दुआ करता है
और हर चीज़ बदल सकती है, क़िस्मत के सिवा
आख़िर तो दुआएं भी हैं, दरे परदा शिकायत
लो अब न उठाएंगे कभी दस्ते-दुआ हम
पूछा न जाएगा जो, वतन से निकल गया
बेकार है जो दाँत, दहन से निकल गया
इज़्ज़त उसे मिली, जो वतन से निकल गया
वो फूल सर चढ़ा, जो चमन से निकल गया
बुलबुल को प्यार बाग़ से, कोयल को बन से प्यार
क्यों कर न आदमी को हो, अपने वतन से प्यार
दैरो-हरम हैं, शेख़ो-बरहमन, के वास्ते
हम जिनको पूजते हैं वो, पत्थर ही और हैं
रिन्द एक, बादा एक, न पैमाना, एक है
बिलइत्तिफ़ाक़, साक़िए-मैख़ाना, एक है