ईसाई हों कि हिन्दू हांे, मुसलिम हों ख़्वाह सिख
सब नाम पर हों सुल्ह, के क़ुरबां ख़ुदा करे
ये ख़ून है जो दिले-ग़मज़दा, को भर देगा
ये ख़ून हिन्दू-ओ-मुसलिम को, एक कर देगा
आ मज़हबों के झगड़े, यकदम सभी भुला दें
आ दिल से, इम्तियाज़े-दैरो-हरम मिटा दें
हरम के फूल, कलीशा के फूल, दैर के फूल
जो मिल गए हैं, तो आई है, इस चमन में बहार
किसी रईस की महफ़िल का, ज़िक्र क्या है ‘अमीर’
ख़ुदा के घर भी न जाएंगे, बिन बुलाए हुए
वो ख़ुद अता करें तो, जहन्नम भी है बेहतर
माँगी हुई निजात मिरे, काम की नहीं
फ़रिश्तों से बेहतर है, इन्सान होना
मगर इसमें होती है, मेहनत ज़्यादा
इलाही सोज़े-दिल की, आदमी को भी ज़रूरत है
फ़क़त पत्थर के सीने को, शरर देने से क्या होगा